Month: December 2015

Summer’s Cold

My dreams seems life,life seems dream,

I jump,I slip,when walk through the clouds,

searching for MY Love’s pinkish cloud,

but I’m alone in this shadowy life,

Where Is MY heart?that is a kid,

beats in MY Romeo’s side,

So Please come here you,MY Angel,down,

wipe MY tears,make them pearl,

and I need your hold tight, all the night,

in this summer’s cold.

I chase MY shadow,MY shadow chases me,

laugh. I cry,when look into dense dark,

looking for My Love’s ruddy gleam,

but i don’t want golden throne, up in the sky,

i just want Rose, Rose of happiness and your smile,

So Please come here you,My Angel,down,

make these pebbles,a lovely crown,

and i need your hold tight, all the night,

in this summer’s cold..

ज़िंदगी एक गीत।

ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी क्रोध कभी प्रीत,
ज़िंदगी एक गीत।

इसके सफ़र में, मंजिलें हैं कई,
होवे कर्म तो, है मंजिलों से मीत,
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी शुष्क कभी शीत,
ज़िंदगी एक गीत।

ज़िंदगी एक खेल, एक तमाशा है,
बदलते समय, बदलते समाज में,
इसकी सिर्फ एक परिभाषा है,
आज संघर्ष, कल हर्ष,
उत्कृष्ठ, उत्कर्ष अभिलाषा है,
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी क्रोध कभी प्रीत,
ज़िंदगी एक गीत।

ज़िंदगियाँ तमाम हैं,
कभी नामी, तो कभी गुमनाम है,
कर्मठ को जानी,
                      बस यहाँ भाग ही बदनाम है,
सुबह खुशी, शाम को गम,
तो कभी सुनसान है,
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी शुष्क कभी शीत,
ज़िंदगी एक गीत।

ज़िंदगी कभी ना खोती है,
हताशा में रोती, तो उम्मीद से खुश होती है,
कभी भ्रम में हार,
                       तो कभी जीत में छल है,
लेकिन कमबख्त कभी होती ना बंजर है।
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी क्रोध कभी प्रीत,
ज़िंदगी एक गीत।

ज़िंदगी एक कृति है, स्वयं की प्रकृति है,
जैंसा ढालेगा, ढलेगी,
जैंसा  सृजन, वो बनेगी,
मन-आकांक्षा, ह्रदय विशाल,
ज़िंदगी है एक समंदर,
                              तो है एक जाल,
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी शुष्क कभी शीत,
ज़िंदगी एक गीत।

ज़िंदगी एक खोज है,
स्वतंत्र की सोच है,
सम में तम,
               तो विषम में विशेष है,
ज़िंदगी में कभी तेज़,
                            तो कभी शांति है,
लेकिन मिटाती हर भ्रांति है।
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी क्रोध कभी प्रीत,
ज़िंदगी एक गीत,
                       कभी शुष्क कभी शीत।

Shubham Agnihotri

Smiling By Now!

I can See you-from far away,

you walk alone, walk alone on the way…

So shine-So bright,no dark in this night,

And moon shines once, just to see your smile,

a fairy girl,new in my town, her sooty eyes, I do dance like a clown,

As,fall has gone,don’t walk alone any more,

just hang on,I wanna be-be along,

here’s a castle in my heart, waiting for you,

heaven does know,flakes of snow,

that was the vile,smiling by Now,smiling by Now…….

I can hear you from far away,

you sing alone, sing alone on the way,

So mild-So sweet,no harsh no heat,

the sea is calm once,just to hear your sound,

a fairy girl,new in my town, her sooty eyes,I do dance like a clown,

As,winter comes,don’t sing alone any more,

just hold on,I wanna be-be along,

here’s a castle in my heart, waiting for you,

heaven does know,flakes of snow,

that was the vile,smiling by Now,smiling by Now……

Police on Duty. (कर्तव्य पथ पर पुलिस)

इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है,
देशभक्ति-जनसेवा, करते अपार हैं।

हर पल ये, हर क्षण ये, दिन में ये, रात में ये,
शीत में-निदाघ में ये, बसंत में-विषाद में ये,
भीषण बरसात में ये, ये करते कर्मदान हैं,
        इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है।

चोर हो, डकैत हो, शोषी या लठैत हो,
दुष्ट या आखेट हो, आतंकी या घुसपैठ हो,
ना राजा,कोई तंत्र है, बस इनका एक मंत्र है,
दहन-सहन करके भी, ये सबका शमन करते हैं,
        इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है।

चाहे भीड़ हो त्योहार की,या विरोध में हज़ार की,
बेफ़िक्र हैं ये जान को, तत्पर हैं भू की आन को,
विधि के विधान को, न्याय के सम्मान को,
चपला सी चाल से, ये सेवा बेमिसाल करते हैं,
       इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार हैं।

जन-जनित आपदा में, प्रकृति की विपदा में,
दहशत की फिज़ा में,फिजूल की सजा में,
ना पक्ष-ना विपक्ष है, बस इनका एक लक्ष्य है,
शांति-सुरक्षा को, ये फिर बहाल करते हैं,
       इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है।

Shubham Agnihotri

सुनसान राह? (Sunsaan Raah?)

मैं चला, चलता ही गया हूँ,
आज सहमा हूँ, मगर डरता ना रहा हूँ,
ना जाने क्या बदला, पथ तो वही है,
रात की चादर, ना काली नई है,
मीनारों की बुर्जें, ना तो बेरंग हैं,
राह सुनसान नही, बस राहगीर कम हैं।

मैं चला, चलता ही गया हूँ,
आज सिसका हूँ, मगर रोता ना रहा हूँ,
ना जाने क्या बदला, पतझड़ तो वही है,
बसंत के आने की, हर ख्वाहिश नई है,
आशाओं के मोती, चमकते ना कम हैं,
सूरज तो वही, बस मौसम नम है।

राह सुनसान नही, बस राहगीर कम हैं।

मैं चला, चलता ही गया हूँ,
आज गिरा हूँ, मगर बैठा ना रहा हूँ,
ना जाने क्या बदला, संघर्ष तो वही है,
संघर्ष के समर मे, हर जीत नई है,
हौंसलों के शोले, दहकते ना कम हैं,
मेरी दृढ़ता के आगे, हर विपत्ति नरम है।

राह सुनसान नही, बस राहगीर कम हैं।

Shubham Agnihotri

My Angel

My Angel has flown,away,

but dropped his remains,golden rays,

he’s gone,made myself done,

done to ascend,in destiny’s lane.

Now don’t bewail,my greedy eyes,

his smile was an omen,for future sight,

you can’t see,too bright,

just show me the path that,i decide,

Now don’t vex me,my imbecile mind,

his wings was mentor,

lightened my way in-night,

you can’t conceive,too pristine,

just walk along,on my dawn’s plan,

Now don’t cry,my abysmal heart,

his shadow was a spirit,

erases my ignorance,of dark,

you can’t perceive,too adroit,

I Grab my luck,like palm in palm,

My angel has flown,away,

here his memories will last,

lasts when; I’m young,while flashes in grey,

My Angel has flown away.

ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं,
लपेटे हुये हैं समंदर,
फिर भी प्यासी तड़पती हैं,
ऊपर आकाश मे देख जो सिकुड़ती हैं,
बादल से इक बूँद की आश मे पूरी खुलती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

समेटे हैं अंगारों को,
फिर भी राख लगती हैं,
पड़े जो इक चिंगारी चमक कर,
तो खुद ही बयां करती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

बिन पंख उड़ सकती हैं मीलों,
फिर भी क़दमों की राह तकती हैं,
बेखुदी मे बोलती, मदहोशी मे खेलती,
पलकें झुकाते ही खाव् बुनती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

हैं नगीने भी फीके, इनकी चमक पर,
फिर भी पत्थर के फलक चूमती हैं,
तसल्ली मे डूबी, हया मे झुकी,
बेशर्मी से दबी, ये फिसल के उठना सीखती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

बसाती हैं जन्नत को,
फिर भी रूखी लगती हैं,
हैं मन्नतों के तीर इनके,जो छोड़े बेवक़्त,
निशाना कोई और, या खुद बनती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

Shubham Agnihotri