प्यासी भारत माता।

माता कभी कुछ नहीं बाँटती वो तो सब कुछ सबको देती है और बराबरी से देती है।
इस देश की धरती मेरी माता है, और मैं ही केवल इसका बेटा नहीं अपितु इसकी सवा अरब संतान और भी हैं? नहीं,इसकी धरती पर तो हर जीवित प्राणी इसकी संतान है, सारे जानवर और सारे पक्षी। इस माता ने हमारी प्यास बुझाई है, तो भूख भी मिटाई है और फिर हमारा तो मानो क़र्ज़ वापसी का कोई फ़र्ज़ ही नहीं है? आज तो हम अपनी माता को लेकर लड़ बैठे हैं कि ये मेरी है, नहीं ये मेरी है। और बेचारी माता का आधा शरीर प्यासा तड़प रहा है।
जब माता परेशानी में है तो बेटे खुश हो नहीं सकते? हाँ, हो सकते हैं क्योंकि बेटों ने तो माँ का बँटवारा कर लिया है और उसकी नसों को काटकर उनमे टाँके लगा दिये हैं। हमारी माता जो हरी चुनरिया ओढे हुए थी,आज धीरे धीरे उसके बेटों ने ही उतार ली।
      हाँ, माता चाहे कितनी भी बीमार हो गई हो इसकी परवाह नहीं है बस बेटे तो इस पर लड़ रहे हैं कि जयकार का उदघोष मैं करता हूँ और माँ की देखभाल तू कर?
तो दूसरा तो माँ को ही स्वीकार करने में संकोच करता है, माँ की देखभाल और जयकार तो दूर की बात है। मेरी माता के कुछ बेटे तो विवेक-अविवेक को कुछ ज्यादा ही अच्छे से समझते हैं, शायद इसीलिए वो उस माता को छलनी करके अपने सवारी के निर्जीव जानवरों की चमक दमक और शान में जल की जान लेते हैं।
कुछ बेटों को प्यास नही है क्योंकि कुछ गले कभी सूखते नहीं हैं लेकिन उन्हें शौक़ की प्यास लगती है तो वो हरी घाँस में अपनी प्यास बुझाते हैं, वो खुद ही कचरा कर उसे जल की बौछारों से हटाने में अपनी प्यास बुझाते हैं और उस जल के बहाने ही वो माता को चूस जाते हैं और फिर क्या? वो शौक़ रखने वाले इंसानों में कुछ जयकार लगाते भी हैं और कुछ नहीं भी और जो बेटे इन बेटों की भूख मिटाते हैं वो खुद ही भूखे-प्यासे रह जाते हैं। अब उनके सूखे गले से कहाँ से आवाज़ निकले लेकिन फिर भी वो उस माँ की सेवा करते हैं और उसकी जयकार लगाते हैं, आखिर माँ कैंसी भी हो वो है तो माँ ही। शायद ये बात केवल साधारण इंसान समझ पाते हैं, जो असाधारण हैं वो तो नारे लगवाते हैं चाहे बग़ावत के हों या समर्थन के। उनकी चालाकी ना हम और ना तुम समझ पाते हैं।
भारत माता की जय।
*जल संरक्षण क्योंकि पैसा कभी समंदर का पानी ना बन जाये,जो खूब है लेकिन प्यास ना बुझाए।

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