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Smiling By Now!

I can See you-from far away,

you walk alone, walk alone on the way…

So shine-So bright,no dark in this night,

And moon shines once, just to see your smile,

a fairy girl,new in my town, her sooty eyes, I do dance like a clown,

As,fall has gone,don’t walk alone any more,

just hang on,I wanna be-be along,

here’s a castle in my heart, waiting for you,

heaven does know,flakes of snow,

that was the vile,smiling by Now,smiling by Now…….

I can hear you from far away,

you sing alone, sing alone on the way,

So mild-So sweet,no harsh no heat,

the sea is calm once,just to hear your sound,

a fairy girl,new in my town, her sooty eyes,I do dance like a clown,

As,winter comes,don’t sing alone any more,

just hold on,I wanna be-be along,

here’s a castle in my heart, waiting for you,

heaven does know,flakes of snow,

that was the vile,smiling by Now,smiling by Now……

Police on Duty. (कर्तव्य पथ पर पुलिस)

इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है,
देशभक्ति-जनसेवा, करते अपार हैं।

हर पल ये, हर क्षण ये, दिन में ये, रात में ये,
शीत में-निदाघ में ये, बसंत में-विषाद में ये,
भीषण बरसात में ये, ये करते कर्मदान हैं,
        इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है।

चोर हो, डकैत हो, शोषी या लठैत हो,
दुष्ट या आखेट हो, आतंकी या घुसपैठ हो,
ना राजा,कोई तंत्र है, बस इनका एक मंत्र है,
दहन-सहन करके भी, ये सबका शमन करते हैं,
        इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है।

चाहे भीड़ हो त्योहार की,या विरोध में हज़ार की,
बेफ़िक्र हैं ये जान को, तत्पर हैं भू की आन को,
विधि के विधान को, न्याय के सम्मान को,
चपला सी चाल से, ये सेवा बेमिसाल करते हैं,
       इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार हैं।

जन-जनित आपदा में, प्रकृति की विपदा में,
दहशत की फिज़ा में,फिजूल की सजा में,
ना पक्ष-ना विपक्ष है, बस इनका एक लक्ष्य है,
शांति-सुरक्षा को, ये फिर बहाल करते हैं,
       इनकी अपनी धार है, कंधों पे इनके भार है।

Shubham Agnihotri

सुनसान राह? (Sunsaan Raah?)

मैं चला, चलता ही गया हूँ,
आज सहमा हूँ, मगर डरता ना रहा हूँ,
ना जाने क्या बदला, पथ तो वही है,
रात की चादर, ना काली नई है,
मीनारों की बुर्जें, ना तो बेरंग हैं,
राह सुनसान नही, बस राहगीर कम हैं।

मैं चला, चलता ही गया हूँ,
आज सिसका हूँ, मगर रोता ना रहा हूँ,
ना जाने क्या बदला, पतझड़ तो वही है,
बसंत के आने की, हर ख्वाहिश नई है,
आशाओं के मोती, चमकते ना कम हैं,
सूरज तो वही, बस मौसम नम है।

राह सुनसान नही, बस राहगीर कम हैं।

मैं चला, चलता ही गया हूँ,
आज गिरा हूँ, मगर बैठा ना रहा हूँ,
ना जाने क्या बदला, संघर्ष तो वही है,
संघर्ष के समर मे, हर जीत नई है,
हौंसलों के शोले, दहकते ना कम हैं,
मेरी दृढ़ता के आगे, हर विपत्ति नरम है।

राह सुनसान नही, बस राहगीर कम हैं।

Shubham Agnihotri

ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं,
लपेटे हुये हैं समंदर,
फिर भी प्यासी तड़पती हैं,
ऊपर आकाश मे देख जो सिकुड़ती हैं,
बादल से इक बूँद की आश मे पूरी खुलती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

समेटे हैं अंगारों को,
फिर भी राख लगती हैं,
पड़े जो इक चिंगारी चमक कर,
तो खुद ही बयां करती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

बिन पंख उड़ सकती हैं मीलों,
फिर भी क़दमों की राह तकती हैं,
बेखुदी मे बोलती, मदहोशी मे खेलती,
पलकें झुकाते ही खाव् बुनती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

हैं नगीने भी फीके, इनकी चमक पर,
फिर भी पत्थर के फलक चूमती हैं,
तसल्ली मे डूबी, हया मे झुकी,
बेशर्मी से दबी, ये फिसल के उठना सीखती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

बसाती हैं जन्नत को,
फिर भी रूखी लगती हैं,
हैं मन्नतों के तीर इनके,जो छोड़े बेवक़्त,
निशाना कोई और, या खुद बनती हैं,
ना जाने ये नज़रें क्या ढूंढती हैं।

Shubham Agnihotri

“Imploring World”

Some dwell sleepy,
in city of dreams,
Some dwell creepy,
in city of screams,
the city is one but who divides whom?
One kite flies to No height,in Sky,
here who tugs whom?
Peace for all but wars freely roam,
some smile,some cry
but No one hugs one form.

Some sense envy,in city of sedition,
Some sense zeal,in city of volition,
The souls are same but who defies whom?
One flag hoists for No time,in air,
here who sucks up whom?
All hate lies but truth truly burns,
some-exult,some-yell But No one dabs bad Foam.

Some thrive daily,in city of Veracity,
Some starve daily,in city of Venality,
world is one but who halts whom?
All wish for utopia but sloth makes reign,
Races want races but just dwarfs win,
The Shadows are same but light defeats them,
Some palliate,Some founder but No one rubs blames.

Shubham Agnihotri

Mirrored Bird

They breathe in the redolence of my wings,
Inspires them to fly,
My feathers are so Vibrant,
each flight crosses the Sky,
Modesty comes to define,
if I dive down ever to raise ’em high,
I’m the bird that mirror refines.

They dream in the glint of my eyes,
shelters them to desire,
My sights are so keen,
each reverie comes to down,
patience has to define,
If I doze off ever to make ’em bright,
I’m the bird that mirror refines.

They utter in the firmness of my beak,
impels them to vie,
My words are So Snappy,
Each Word meets its line,
Rights get in to define,
If I Strike dumb down ever to
turn ’em open-eyed,
I’m the bird that mirror refines.